Makhanlal Chaturvedi Ka Jivan Parichay

(जीवनकाल सन् 1889 ई॰ से सन् 1968 ई॰)

राष्ट्रहित को ही अपना परम लक्ष्य मान लेनेवाले कवियों में माखनलाल चतुर्वेदी का नाम विस्मृत कर पाना कठिन होगा। ये एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने युग की आवश्यकता को पहचाना। परतन्त्र भारतीयों की दीन-हीन दशा को देखकर इनकी आत्मा चीत्कार कर उठी। ये एक ऐसे कवि थे, जो सर्वस्व देकर भी अपने देश के सर्वविध उत्थान की कामना करते थे। राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत होने के कारण ही इन्हें हिन्दी-साहित्य के क्षेत्र में 'भारतीय आत्मा' के नाम से सम्बोधित किया जाता है। डॉ॰ राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी ने माखनलालजी के राष्ट्रीय भावना पर आधारित गीतों के प्रभाव के सम्बन्ध में लिखा है, "चतुर्वेदीजी हिन्दी के तीन श्रेष्ठ प्रलय गीत-गायकों में से एक हैं। राष्ट्र के अनेक बलिदानियों ने इनके गीत गाते-गाते मातृभूमि को अपने प्राणों की भेंट चढ़ाई है। देश की सूखी नसों में इनके गीत अब भी नई जवानी फूॅंकते हैं।"

जीवन परिचय- क्रान्ति के अमर गायक माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म सन् 1889 ई॰ में मध्य प्रदेश के बावई नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता पं॰ नन्दलाल चतुर्वेदी अध्यापक थे। प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद इन्होंने घर पर ही संस्कृत, बाॅंग्ला, गुजराती और अंग्रेजी भाषा का अध्ययन किया तथा कुछ समय तक अध्यापन कार्य भी किया। तत्पश्चात् खण्डवा से 'कर्मवीर' नामक साप्ताहिक पत्र निकालना प्रारम्भ किया। सन् 1913 ई॰ में ये सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिका 'प्रभा' के सम्पादक नियुक्त हुए। चतुर्वेदीजी 'एक भारतीय आत्मा' नाम से लेख, कविताऍं लिखते रहे। इनकी कविताऍं देशप्रेम के मतवाले युवकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनीं।

श्री गणेशशंकर विद्यार्थी की प्रेरणा तथा साहचर्य के कारण ये राष्ट्रीय आन्दोलनों में भाग लेने लगे। इन्हें अनेक बार जेल-यात्राऍं भी करनी पड़ीं। जेल से छूटने पर सन् 1943 ई॰ में ये 'हिन्दी-साहित्य सम्मेलन' के अध्यक्ष बने। हरिद्वार में महन्त शान्तानन्द की ओर से चाॅंदी के रुपयों से इनका तुलादान किया गया। भारत सरकार ने इन्हें 'पद्म-विभूषण' की उपाधि से विभूषित किया। मध्य प्रदेश सरकार ने भी इन्हें पुरस्कृत किया। 80 वर्ष की आयु में 30 जनवरी, सन् 1968 ई॰ को इनका स्वर्गवास हो गया।

माखनलाल चतुर्वेदीजी का साहित्यिक जीवन पत्रकारिता से प्रारम्भ हुआ। इनमें देशप्रेम की प्रबल भावना विद्यमान थी। अपने निजी संघर्षों, वेदनाओं और यातनाओं को इन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से व्यक्त किया। 'कोकिल बोली' शीर्षक कविता में इनके बन्दी जीवन के समय प्राप्त यातनाओं का मर्मस्पर्शी चित्रण हुआ है। इनका सम्पूर्ण साहित्यिक जीवन राष्ट्रीय विचारधाराओं पर आधारित है। ये आजीवन देशप्रेम और राष्ट्र-कल्याण के गीत गाते रहे। इनके राष्ट्रवादी भावनाओं पर आधारित काव्य में त्याग, बलिदान, कर्त्तव्य-भावना और समर्पण के भाव निहित हैं। ब्रिटिश साम्राज्य के अत्याचारों को देखकर इनका अन्तर्मन ज्वालामुखी की तरह धधकता रहता था। अपनी कविताओं में प्रेरणा, हुंकार, प्रताड़ना, उदबोधन और मनुहार के भावों को भरकर ये भारतीयों की सुप्त चेतना को जगाते रहे।

भारतीय संस्कृति, प्रेम, सौन्दर्य और आध्यात्मिकता पर भी इन्होंने अनेक हृदयस्पर्शी चित्र अंकित किए हैं।

चतुर्वेदीजी के काव्य का मूलस्वर राष्ट्रीयतावादी है। राष्ट्रीयता इनके काव्य का कलेवर है, तो भक्ति और रहस्यवाद उसकी आत्मा।

इनकी कृतियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-

  1. कृष्णार्जुन-युद्ध- यह अपने समय की प्रसिद्ध रचना रही है। इसमें पौराणिक नाटक को भारतीय नाट्य-परम्परा के अनुसार प्रस्तुत किया गया है। अभिनय की दृष्टि से यह अत्यधिक सशक्त रचना है।
  2. साहित्य-देवता- यह चतुर्वेदीजी के भावात्मक निबन्धों का संग्रह है।
  3. हिमतरंगिनी- यह इनकी 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' से पुरस्कृत रचना है।
  4. कला का अनुवाद- यह इनकी कहानियों का संग्रह है।
  5. सन्तोष, बन्धन-सुख- इनमें गणेशशंकर विद्यार्थी की मधुर स्मृतियाॅं हैं।
  6. रामनवमी- इन कविताओं में देशप्रेम और प्रभुप्रेम को समान रूप से चित्रित किया गया है।
'युगचरण', 'समर्पण', 'हिमकिरीटिनी' और 'वेणु लो गूॅंजे धरा' इनके अन्य काव्य-संग्रह हैं।

चतुर्वेदीजी ने ओजपूर्ण भावात्मक शैली का प्रयोग किया है। इनकी शैली में छायावादी लाक्षणिकता परिलक्षित होती है। चतुर्वेदीजी की कविताओं में कल्पना की ऊॅंची उड़ान के साथ ही भावों की तीव्रता भी दृष्टिगोचर होती है।

माखनलाल चतुर्वेदीजी की रचनाऍं हिन्दी-साहित्य की अक्षय निधि हैं, जिन पर हिन्दी- साहित्य-प्रेमियों को गौरवानुभूति होती है।


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