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Bhagwat Sharan Upadhyay Ka Jeevan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1910 ई॰ से सन् 1982 ई॰ ) पुरातत्त्व कला के पंण्डित, भारतीय संस्कृति और इतिहास के सुप्रसिद्ध विद्वान् एवं प्रचारक तथा लेखक डॉ॰ भगवतशरण उपाध्याय का हिन्दी-साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट स्थान है। उपाध्यायजी अनेक भाषाओं के ज्ञाता थे। संस्कृत और पुरातत्त्व के महान् विद्वान् उपाध्यायजी ने अंग्रेजी में भी अनेक उच्चकोटि के ग्रन्थ लिखकर विदेशों में भी अपना नाम अमर किया है। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में इनकी सौ से अधिक कृतियाॅं प्रकाशित हुई हैं। जीवन परिचय - भगवतशरण उपाध्याय का जन्म सन् 1910 ई॰ में बलिया जिले के उजियारपुर गाॅंव में हुआ था। अपनी प्रारम्भिक शिक्षा समाप्त करने के पश्चात् उपाध्यायजी काशी आए और यहीं से प्राचीन इतिहास में एम॰ ए॰ किया। ये संस्कृत-साहित्य तथा पुरातत्त्व के परम ज्ञाता रहे हैं तथा इन्होंने हिन्दी-साहित्य की उन्नति में भी विशेष योगदान दिया है। पुरातत्त्व एवं प्राचीन भाषाओं के साथ-साथ इन्होंने आधुनिक यूरोपीय भाषाओं का भी गहन अध्ययन किया। उपाध्यायजी ने क्रमशः 'पुरातत्त्व विभाग' , 'प्रयाग संग्रहालय' , 'लखनऊ संग्रहालय' के अध...

Surdas Ka Jivan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1478 ई॰ से सन् 1583 ई॰ ) सूरदास हिन्दी के भक्त-कवियों में शिरोमणि माने जाते हैं। इन्होंने अपने पदों में श्रीकृष्ण की बाललीलाओं और प्रेमलीलाओं का मनमोहक चित्रण किया है। इनका 'सूरसागर' तो मानो वात्सल्य और श्रृंगार का सागर है। इनकी अन्धी ऑंखों ने जिस रूप एवं भाव-सौन्दर्य को देखा, उसे देखने के लिए 400 वर्षों से कवियों की ऑंखें तरस रही थीं। इनमें न जाने कैसा प्रकाश था, जो प्रकृति और मानव-हृदय की असीम गहराइयों तक पहुॅंच जाता था। वात्सल्य एवं श्रृंगार पर आधारित इनकी अद्वितीय रचनाओं के सन्दर्भ में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, "वात्सल्य और श्रृंगार के क्षेत्रों का जितना अधिक उद्घाटन सूर ने अपनी बन्द ऑंखों से किया, उतना संसार के किसी और कवि ने नहीं। इन क्षेत्रों का वे कोना-कोना झाॅंक आए।" जीवन परिचय - महाकवि सूरदास का जन्म रुनकता नामक ग्राम में सन् 1478 ई॰ में पं॰ रामदास के घर हुआ था। पं॰ रामदास सारस्वत ब्राह्मण थे। कुछ विद्वान् सीही नामक स्थान को सूरदास का जन्मस्थल मानते हैं। सूरदासजी जन्मान्ध थे या नहीं, इस सम्बन्ध में भी अनेक मत हैं। कुछ लोगों का कहना ह...

Bihari Ka Jeevan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1603 ई॰ से सन् 1663 ई॰ ) गागर में सागर भरनेवाले रीतिकालीन कवि बिहारीलाल हिन्दी-साहित्य की महान् विभूति थे। ये रीतिकालीन कवियों में बिहारी के नाम से अधिक प्रसिद्ध हैं। बिहारी ऐसे कवि थे, जिन्होंने अपनी एकमात्र रचना के आधार पर ही हिन्दी-साहित्य-जगत् में अपनी अमिट छाप छोड़ दी। प्रसिद्ध आलोचक पं॰ पद्मसिंह शर्मा ने बिहारी के काव्य की प्रशंसा करते हुए लिखा है, "बिहारी के दोहों का अर्थ गंगा की विशाल जलधारा के समान है, जो शिव की जटाओं में समा तो गई थी, परन्तु उसके बाहर निकलते ही वह इतनी असीम और विस्तृत हो गई कि लम्बी-चौड़ी धरती में भी सीमित न रह सकी। बिहारी के दोहे रस के सागर हैं, कल्पना के इन्द्रधनुष हैं, भाषा के मेघ हैं। उनमें सौन्दर्य के मादक चित्र अंकित हैं।" जीवन परिचय - रससिद्ध कवि बिहारी का जन्म सन् 1603 ई॰ में ग्वालियर के पास बसुआ-गोविन्दपुर गाॅंव में माना जाता है। इनके पिता का नाम पं॰ केशवराय चौबे था। बचपन में ही ये अपने पिता के साथ ग्वालियर से ओरछा नगर आ गए थे।यहाॅं पर बिहारी ने आचार्य केशवदास के पास काव्यशास्त्र की शिक्षा प्राप्त की। कुछ ही समय में ये काव्...

Jainendra Kumar Ka Jivan Parichay

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  ( जीवनकाल सन् 1905 ई॰ से सन् 1988 ई॰ ) आधुनिक हिन्दी जगत् में जैनेन्द्र कुमार का एक विशिष्ट स्थान है। आप प्रेमचन्दोत्तर युगीन श्रेष्ठ कथाकार के रूप में विख्यात हैं। आपने उपन्यास, कहानी, निबन्ध तथा संस्मरण आदि अनेक गद्यविधाओं को स्वलेखनी से समृद्ध किया है। आपके निबन्ध चिन्तन प्रधान एवं विचारात्मक हैं। जीवन परिचय - जैनेन्द्र कुमार का जन्म अलीगढ़ जिले के कौड़ियागंज नामक कस्बे में सन् 1905 ई॰ में हुआ था। बचपन में ही आपके पिता का देहान्त हो गया और आपका पालन-पोषण माता तथा नाना ने किया। आनन्दीलाल मूल नाम को त्यागकर आपने अपना नाम जैनेन्द्र कुमार रख लिया। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा हस्तिनापुर के जैन गुरुकुल 'ऋषि ब्रह्मचर्याश्रम' में हुई थी। पंजाब से मैट्रिक उत्तीर्ण कर आपने काशी विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। सन् 1921 ई॰ के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण आपकी आगे की शिक्षा का क्रम टूट गया। स्वाध्याय से आपने हिन्दी का गहन ज्ञान प्राप्त किया। स्वतन्त्रता संग्राम आन्दोलन में भाग लेने के कारण आपको अनेक बार जेल यात्राएं करनी पड़ीं। आपने कुछ राजनीतिक पत्रिकाओं का सम्पादन भी किया। सन्...

Vasudev Sharan Agrawal Ka Jivan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1904 ई॰ से सन् 1967 ई॰ ) डॉ॰ वासुदेवशरण अग्रवाल हिन्दी साहित्य में प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं पुरातत्व के मर्मज्ञ विद्वान् थे। आप गम्भीर शोध-दृष्टि वाले साहित्यकार थे। आपने प्राचीन भारतीय इतिहास, साहित्य, संस्कृति एवं महापुरुषों को प्रकाश में लाने का सफल प्रयास किया है। आपका प्रस्तुतीकरण एक नवीनता और निजीपन लेकर आया है। आपके निबन्धों में भारतीय संस्कृति का उदात्त स्वरूप अभिव्यक्त हुआ है। अपनी उपलब्धियों से हिन्दी साहित्य को सम्पन्न कर आपने हिन्दी की महती सेवा की है। जीवन परिचय - वासुदेवशरण जी का जन्म उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद में स्थित खेड़ा नामक ग्राम में सन् 1904 ई॰ में हुआ था। आपके माता-पिता लखनऊ में रहते थे अतः आपने अपनी शिक्षा यहीं प्राप्त की। आपने काशी विश्वविद्यालय से बी॰ ए॰ तथा लखनऊ विश्वविद्यालय से एम॰ ए॰ की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसी विश्वविद्यालय में आपने अपना शोध प्रबन्ध प्रस्तुत किया, जिसका विषय था- पाणिनिकालीन भारत। आपकी रूचि पुरातत्व के अध्ययन में अधिक थी। बाद में आपने डी-लिट्॰ भी लखनऊ विश्वविद्यालय से किया। आप काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के भारती महावि...

Makhanlal Chaturvedi Ka Jivan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1889 ई॰ से सन् 1968 ई॰) राष्ट्रहित को ही अपना परम लक्ष्य मान लेनेवाले कवियों में माखनलाल चतुर्वेदी का नाम विस्मृत कर पाना कठिन होगा। ये एक ऐसे कवि थे, जिन्होंने युग की आवश्यकता को पहचाना। परतन्त्र भारतीयों की दीन-हीन दशा को देखकर इनकी आत्मा चीत्कार कर उठी। ये एक ऐसे कवि थे, जो सर्वस्व देकर भी अपने देश के सर्वविध उत्थान की कामना करते थे। राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत होने के कारण ही इन्हें हिन्दी-साहित्य के क्षेत्र में 'भारतीय आत्मा' के नाम से सम्बोधित किया जाता है। डॉ॰ राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी ने माखनलालजी के राष्ट्रीय भावना पर आधारित गीतों के प्रभाव के सम्बन्ध में लिखा है, "चतुर्वेदीजी हिन्दी के तीन श्रेष्ठ प्रलय गीत-गायकों में से एक हैं। राष्ट्र के अनेक बलिदानियों ने इनके गीत गाते-गाते मातृभूमि को अपने प्राणों की भेंट चढ़ाई है। देश की सूखी नसों में इनके गीत अब भी नई जवानी फूॅंकते हैं।" जीवन परिचय - क्रान्ति के अमर गायक माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म सन् 1889 ई॰ में मध्य प्रदेश के बावई नामक स्थान पर हुआ था। इनके पिता पं॰ नन्दलाल चतुर्वेदी अध्यापक थे। ...

Mahadevi Verma Ka Jivan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1907 ई॰ से सन् 1987 ई॰ ) बुद्ध की करुणा, मीरा की वेदना, सूर का संगीत, छायावादी काव्य की सौन्दर्य-चेतना जिस कवयित्री के काव्य में एकरूप हो गए हैं, उसका नाम है महादेवी वर्मा। इन्हें 'आधुनिक युग की मीरा' कहे जाने का गौरव प्राप्त है। आधुनिक काव्य के साज-श्रृंगार में इन्होंने अविस्मरणीय योगदान दिया। विरह की कवयित्री के रूप में महादेवी के काव्य की समीक्षा करते हुए कविवर सुमित्रानन्दन पन्त ने लिखा है, "उनके काव्य का सर्वप्रथम तत्त्व वेदना, वेदना का आनन्द, वेदना का सौन्दर्य, वेदना के लिए आत्मसमर्पण है। वे तो वेदना के साम्राज्य की एकच्छत्र सम्राज्ञी हैं।" जीवन परिचय - श्रीमती महादेवी वर्मा का जन्म सन् 1907 ई॰ में उत्तर प्रदेश के सुप्रसिद्ध नगर फर्रुखाबाद में होलिका-दहन के पुण्य पर्व के दिन हुआ था। इनकी माता हेमरानी साधारण कवयित्री थीं एवं श्रीकृष्ण में अटूट श्रद्धा रखती थीं। इनके नाना को भी ब्रजभाषा में कविता करने का चाव था। नाना एवं माता के इन गुणों का महादेवी पर भी प्रभाव पड़ा। 9 वर्ष की छोटी उम्र में ही इनका विवाह स्वरूपनारायण वर्मा से हो गया, किन्तु इन्ही...