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प्रताप नारायण मिश्र का जीवन परिचय - Pratap Narayan Mishra Biography In Hindi

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                    (जीवनकाल सन् 1856 ई॰ से सन् 1894 ई॰) आधुनिक हिन्दी-निर्माताओं की बृहत्त्रयी में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, बालकृष्ण भट्ट और प्रतापनारायण मिश्र की गणना होती है। मिश्रजी को यद्यपि न तो भारतेन्दु जैसे साधन मिले थे ओर न ही भट्टजी जैसी लम्बी आयु, फिर भी मिश्रजी ने अपनी प्रतिभा और लगन से उस युग में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान बना लिया था। जीवन परिचय - पं॰ प्रतापनारायण मिश्र का जन्म सन् 1856 ई॰ में उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बैजेगाॅंव में हुआ था। मिश्रजी के जन्म के कुछ दिनों बाद ही इनके ज्योतिषी पिता पं॰ संकटाप्रसाद मिश्र कानपुर आकर सपरिवार रहने लगे। यहीं पर इनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। पिता इन्हें ज्योतिष पढ़ाकर अपने पैतृक व्यवसाय में ही लगाना चाहते थे, परन्तु इनका मनमौजी स्वभाव उसमें नहीं रमा। इन्होंने कुछ समय तक अंग्रेजी स्कूल में भी शिक्षा प्राप्त की, किन्तु कोई भी अनुशासन  और निष्ठा का कार्य, जिसमें विषय की नीरसता के साथ प्रतिबन्धता भी आवश्यक होती, इनके मौजी और फक्कड़ स्वभाव के विपरीत था; अतः ये यहाॅं भी पढ़ न सके। घ...

Kedarnath Singh Ka Jivan Parichay

  ( जीवनकाल सन् 1934 ई॰ से सन् 2018 ई॰ ) जीवन परिचय - केदारनाथ सिंह का जन्म सन् 1934 ई॰ में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के चकिया गॉंव में हुआ था। इनके पिता का नाम डोमन सिंह तथा माता का नाम लालझरी देवी था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा इनके गाॅंव के प्राथमिक विद्यालय से हुई। इन्होंने बनारस विश्वविद्यालय से सन् 1956 ई॰ में हिन्दी में एम॰ ए॰ और सन् 1964 ई॰ में पी-एच॰डी॰ की उपाधि प्राप्त की। इन्होंने अनेक कॉलेजों में पढ़ाया और अन्त में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हुए। इन्होंने कविता व गद्य की अनेक पुस्तकें रची हैं। इन पर इन्हें अनेक सम्माननीय सम्मानों से सम्मानित किया गया। ये समकालीन कविता के प्रमुख हस्ताक्षर हैं। इनकी कविता में गॉंव व शहर का द्वन्द्व स्पष्ट दृष्टिगत है। 'बाघ' इनकी प्रमुख लम्बी कविता है, जिसे नयी कविता के क्षेत्र में मील का पत्थर माना जा सकता है। इनके कविता-संग्रह 'अकाल में सारस' के लिए इन्हें सन् 1989 ई॰ का साहित्य अकादमी पुरस्कार मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, कुमारन आशातन पुरस्कार (केरल), दिनकर पुरस्कार, ...

Kavi Bhushan Ka Jivan Parichay

  ( जीवनकाल सन् 1613 ई॰ से सन् 1715 ई॰ ) जीवन परिचय - वीर रस के सर्वश्रेष्ठ कवि भूषण का जन्म सन् 1613 ई॰ में कानपुर (उत्तर प्रदेश) के त्रिविक्रमपुर (तिकवाॅंपुर) नामक गाॅंव में हुआ था। इनके पिता का नाम पण्डित रत्नाकर त्रिपाठी था। हिन्दी के प्रसिद्ध कवि चिन्तामणि त्रिपाठी और मतिराम इनके भाई थे। इनके वास्तविक नाम के विषय में अभी तक ठीक से पता नहीं चल पाया है। चित्रकूट के सोलंकी राजा रुद्रदेव ने इनकी काव्य-प्रतिभा से प्रभावित होकर, इन्हें 'कवि भूषण' की उपाधि से अलंकृत किया था, तभी से ये भूषण के नाम से प्रसिद्ध हो गए। अनेक राजाओं के आश्रय में रहने वाले कवि भूषण को मनोनुकूल आश्रयदाता दो ही मिले-छत्रपति महाराज शिवाजी और वीर केसरी बुन्देला राजा छत्रसाल। बाद में ये शिवाजी के दरबार में चले गए और जीवन के अन्तिम दिनों तक वहीं रहे। इनका स्वर्गवास सन् 1715 ई॰ के लगभग हुआ। कवि भूषण जी की प्रमुख रचनाऍं इस प्रकार हैं - कवि भूषण की कुल 6 रचनाऍं मानी जाती हैं, लेकिन इनमें से केवल तीन ग्रन्थ ही उपलब्ध हैं- 'शिवराज-भूषण', 'शिवा-बावनी' तथा 'छत्रसाल-दशक' । शिवराज भूषण...

Gajanan Madhav Muktibodh Ka Jeevan Parichay

  ( जीवनकाल सन् 1917 ई॰ से सन् 1964 ई॰ ) जीवन परिचय- गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म 13 नवम्बर, सन् 1917 ई॰ को श्योपुर, जिला मुरैना (मध्य प्रदेश) में हुआ था। मुक्तिबोध के पिता का नाम माधवराव एवं माता का नाम पार्वतीबाई था। इन्दौर के होल्कर कॉलेज से बी॰ ए॰ की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा उज्जैन के मॉडर्न स्कूल में अध्यापक हो गये। सन् 1954 ई॰ में एम॰ ए॰ की परीक्षा उत्तीर्ण करके राजनाॅद गाॅंव के दिग्विजय कॉलेज में प्राध्यापक नियुक्त हुए। कामवाली की पुत्री शान्ताबाई से विवाह किया। 'हंस' का सम्पादन भी किया। मुक्तिबोध का जीवन अभाव-संघर्ष एवं आर्थिक-विपन्नता में कटा तथा सितम्बर सन् 1964 ई॰ में इनका स्वर्गवास हो गया। चालाक बुद्धिजीवियों की स्वार्थपरता पर गहरी चोट करने वाले मुक्तिबोध प्रायः अस्पष्ट हो गये हैं। सुविधाप्रिय जीवन-पद्धति पर तीखा प्रहार करते हुए मुक्तिबोध ने अपनी सामाजिक भावना को प्रकट किया है। छायावादी लिजलिजेपन और प्रगतिवादी थोथे नारों और हुल्लड़बाजी के प्रति असहमति प्रकट करते हुए मुक्तिबोध ने शोषण और भेड़चाल का बड़ा सशक्त विरोध अपनी रचनाओं के माध्यम से किया है। कृतित्व एवं ...

Jagannath Das Ratnakar Ka Jeevan Parichay

  ( जीवनकाल सन् 1866 ई॰ से सन् 1932 ई॰ ) जीवन परिचय - आधुनिक काल के ब्रजभाषा के सर्वश्रेष्ठ कवि जगन्नाथदास 'रत्नाकर' का जन्म काशी के एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में सन् 1866 ई॰ में हुआ था। 'रत्नाकर' जी के पिता श्री पुरुषोत्तमदास भारतेन्दु जी के समकालीन, फारसी भाषा के विद्वान् और हिन्दी काव्य के मर्मज्ञ थे। भारतेन्दु जी ने बाल्यावस्था में ही इनके विषय में कहा था "यह लड़का कभी एक अच्छा कवि होगा।" सन् 1891 ई॰ में वाराणसी के क्वीन्स कॉलेज से बी॰ ए॰ की डिग्री प्राप्त की। रत्नाकर जी पहले 'जकी' के उपनाम से उर्दू में कविता लिखा करते थे, बाद में वे 'रत्नाकर' उपनाम से हिन्दी में कविताऍं लिखने लगे। वे सन् 1902 ई॰ में अयोध्या-नरेश के निजी सचिव नियुक्त हुए और सन् 1928 ई॰ तक इसी पद पर रहे। सन् 1932 ई॰ में इनकी मृत्यु हरिद्वार में हुई। राजदरबार से सम्बद्ध होने के कारण इनका रहन-सहन सामन्ती था, लेकिन इनमें प्राचीन धर्म, संस्कृति और साहित्य के प्रति गहरी आस्था थी। इन्हें प्राचीन भाषाओं का अच्छा ज्ञान था तथा ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं में गति भी थी। ...

Narendra Sharma Ka Jivan Parichay

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  ( जीवनकाल सन् 1913 ई॰ से सन् 1989 ई॰ ) जीवन परिचय - नरेन्द्र शर्मा का जन्म बुलन्दशहर (उत्तर प्रदेश) जिले के जहाॅंगीरपुर नामक ग्राम में 28 फरवरी, सन्  1913 ई॰ में हुआ था। इनके पिता श्री पूरनलाल शर्मा एवं माता श्रीमती गंगादेवी थीं। जब ये 4 वर्ष के थे इनके पिता का स्वर्गवास हो गया। इनकी प्राथमिक शिक्षा गाॅंव में हुई। इन्होंने हाईस्कूल सन् 1929 ई॰ में, इण्टरमीडिएट सन् 1931 ई॰ में किया तदुपरान्त सन् 1931 ई॰ से सन् 1936 ई॰ तक प्रयाग में अध्ययन करते हुए सन् 1936 ई॰ में एम॰ ए॰ की परीक्षा प्रयाग विश्वविद्यालय से उत्तीर्ण की। सन् 1937 ई॰ में 'भारत' के सहकारी सम्पादक बनें। सन् 1938 ई॰ से सन् 1940 तक आन्दोलनों में भाग लेने के कारण जेल यातनाऍं सहन कीं। सन् 1940 ई॰ में काशी विद्यापीठ में अध्यापन कार्य किया तथा सन् 1943 ई॰ में फिल्मजगत में प्रवेश कर फिल्मी गीत लिखे। आपने आकाशवाणी में अवैतनिक कार्यक्रम नियोजक के रूप में कार्य किया। सन् 1966 ई॰ से आप मुम्बई केन्द्र में विविध भारती के चीफ-प्रोड्यूसर रहे तथा 11 फरवरी, सन् 1989 ई॰ को आपका स्वर्गवास हो गया। कृतित्व एवं व्यक्तित्व ...

Bhawani Prasad Mishra Ka Jeevan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1914 ई॰ से सन् 1985 ई॰ ) जीवन परिचय - पण्डित भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म 23 मार्च, सन् 1914 ई॰ में सिवनी, मालवा तहसील की सीमा से लगे हुए, रेवा तट पर बसे टिगरिया नामक ग्राम जिला होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) में हुआ था। इनके पिता श्री सीताराम मिश्र एवं माता श्रीमती गोमती देवी थीं। मिश्र जी का बचपन खण्डवा, बैतूल एवं सुहागपुर आदि में बीता था। आपने बी॰ ए॰ की परीक्षा जबलपुर के ऐबर्टसन कॉलेज से उत्तीर्ण की। सन् 1942 ई॰ मे स्वाधीनता में सक्रिय भाग लेने के परिणामस्वरूप आपको 3 वर्ष तक कारागार-यातना सहन करनी पड़ी। मिश्र जी ने वर्धा महिला आश्रम में कुछ समय तक अध्यापन कार्य किया। पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया, चित्रपट गीत लिखे, आकाशवाणी बम्बई केन्द्र में हिन्दी विभाग के प्रधान पद पर कार्य किया। इसके बाद 'सम्पूर्ण गांधी वाङ्मय' का सम्पादन किया। 20 फरवरी, सन् 1985 ई॰ को इनका स्वर्गवास हो गया। कृतित्व एवं व्यक्तित्व - आपकी प्रमुख रचनाऍं इस प्रकार हैं - तारसप्तक में संकलित कविताऍं, गीतफरोश, चकित है दुःख, ॲंधेरी कविताऍं, बुनी हुई रस्सी, गाॅंधी पंचशती। अनाम तुम अति हो, त्रिकाल स...

Ayodhya Singh Upadhyay Ka Jeevan Parichay

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 ( जीवनकाल सन् 1865 ई॰ से सन् 1945 ई ॰) जीवन परिचय - अयोध्यासिंह उपाध्याय का जन्म सन् 1865 ई॰ में निजामाबाद, जिला आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था। इनके पिता का नाम पण्डित भोलासिंह उपाध्याय था। 5 वर्ष की अवस्था में फारसी के माध्यम से इनकी शिक्षा प्रारम्भ हुई। वर्नाक्यूलर मिडिल पास करके ये क्वींस कालेज, बनारस में ॲंग्रेजी पढ़ने गये पर अस्वस्थता के कारण अध्ययन छोड़ना पड़ा। स्वाध्याय से इन्होंने हिन्दी, संस्कृत, फारसी और ॲंग्रेजी में अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। निजामाबाद के मिडिल स्कूल के अध्यापक, कानूनगो और काशी विश्वविद्यालय में अवैतनिक-शिक्षक के पदों पर इन्होंने कार्य किया। सन् 1945 ई॰ में इनका स्वर्गवास हो गया। कृतित्व एवं व्यक्तित्व- इनकी प्रमुख काव्य-रचनाऍं 'प्रियप्रवास' (खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य), 'वैदेही-वनवास' (करुणरस प्रधान महाकाव्य), 'पारिजात' (स्फुट गीतों का क्रमबद्ध संकलन), 'चुभत-चौपदे', 'चोखे-चौपदे' (दोनों बोलचाल वाली मुहावरों युक्त भाषा में लिखित स्फुट काव्य-संग्रह) और 'रसकलश' (ब्रजभाषा के छन्दों का संकलन) हैं। ...

Premchand Ka Jivan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1880 ई॰ से सन् 1936 ई॰ ) जीवन परिचय - कहानी एवं उपन्यास सम्राट् की उपाधि से विभूषित स्वनाम धन्य प्रेमचन्द का जन्म 31 जुलाई, सन् 1880 ई॰ में उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले के एक छोटे-से गाॅंव लमही में हुआ था। इनके बचपन का नाम धनपतराय था, किन्तु ये अपनी कहानियाॅं उर्दू में 'नवाबराय' के नाम से लिखते थे और हिन्दी में प्रेमचन्द के नाम से। कुछ राजनैतिक कहानियाॅं उन्होंने उर्दू में ही धनपतराय नाम से लिखीं। इनके द्वारा रचित 'सोजे वतन' ने ऐसी हलचल मचायी कि सरकार ने उसे जब्त कर लिया। गरीब परिवार में जन्म लेने और अल्पायु में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण इनका बचपन बड़े कष्टों में बीता, किन्तु जिस साहस और परिश्रम से इन्होंने अपना अध्ययन जारी रखा, वह साधनहीन, किन्तु कुशाग्र-बुद्धि और परिश्रमी छात्रों के लिए प्रेरणाप्रद है। अभावग्रस्त होने पर भी इन्होंने एम॰ ए॰ और बी॰ ए॰ की परीक्षाऍं उत्तीर्ण कीं। प्रारम्भ में ये कुछ वर्षों तक एक स्कूल में 20 रुपये मासिक पर अध्यापक रहे। बाद में शिक्षा विभाग में सब-डिप्टी इंस्पेक्टर हो गये। कुछ दिनों बाद असहयोग-आन्दोलन से सहानु...

Raskhan Ka Jivan Parichay

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  ( जीवनकाल सन् 1533 ई॰ से सन् 1618 ई॰ ) कितने ही मुसलमान कवियों ने हिन्दी-काव्य को समृद्ध करके अपने हिन्दी-प्रेम का परिचय दिया है, किन्तु इन सबमें सबसे अधिक सरस और सुकोमल काव्य यदि किसी का है तो वह रसखान का है। कविवर रसखान सच्चे कवि थे। ये भावों के सागर तथा रस की खान थे। वास्तव में ये भगवान् श्रीकृष्ण के दीवाने थे। इनके हृदय से निकली काव्य-पंक्तियाॅं सभी दृष्टियों से अद्वितीय हैं। डाॅ॰ राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी के शब्दों में, "रसखान भक्तिकाल के सुप्रसिद्ध, लोकप्रिय एवं सरस कवि थे। उनके सवैये हिन्दी-साहित्य में बेजोड़ हैं।" जीवन परिचय - रसखान का नाम सैयद इब्राहीम था। इनका जन्म सन् 1533 ई॰ के लगभग दिल्ली में हुआ माना जाता है। इनका जीवन-वृत्त अभी भी अन्धकार में है। इनका सम्बन्ध दिल्ली के राजवंश से था। इस तथ्य पर निम्नलिखित दोहे से प्रकाश पड़ता है- देखि गदर हित साहिबी, दिल्ली नगर मसान। छिनहिं बादशा वंश की, ठसक छाड़ि रसखान।। डाॅ॰ नगेन्द्र के अनुसार इन पंक्तियों में उल्लिखित 'गदर' और 'दिल्ली' के श्मशान बन जाने का समय विद्वानों ने सन् 1555 ई॰ अनुमानित किया ...

Meerabai Ka Jeevan Parichay

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  ( जीवनकाल सन् 1498 ई॰ से सन् 1546 ई॰ ) जीवन परिचय - कृष्ण की प्रेम-दीवानी और पीर की गायिका मीराबाई जोधपुर के संस्थापक राव जोधाजी की प्रपौत्री एवं रत्नसिंह की पुत्री थीं। इनका जन्म सन् 1498 ई॰ में राजस्थान में मेड़ता के समीप चौकड़ी नामक गाॅंव में हुआ था। बचपन में ही इनकी माता का स्वर्गवास हो गया था; अतः इनका पालन-पोषण दादा की देख-रेख में राजसी ठाट-बाट के साथ हुआ। इनके दादा राव दूदाजी बड़े धार्मिक स्वभाव के थे, जिनका मीरा के जीवन पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। मीरा जब मात्र 8 वर्ष की थीं, तभी उन्होंने अपने मन में कृष्ण को पति-रूप में स्वीकार कर लिया था। इनकी भक्ति-भावना के विषय में डाॅ॰ राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखा है- "बीस वर्ष की अवस्था में ही मीरा विधवा हो गयीं और जीवन का लौकिक आधार छिन जाने पर अब स्वाभाविक रूप से उनका असीम स्नेह, अनन्त प्रेम और अद्भुत प्रतिभास्त्रोत गिरधरलाल की ओर उमड़ पड़ा। मेवाड़ की राजशक्ति का घोर विरोध सहन करके, सभी कष्टों को सहन करते हुए विष का प्याला पीकर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के प्रति अपनी भक्ति-भावना को अक्षुण्ण बनाये रखा।...

Rahimdas Ka Jeevan Parichay

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  ( जीवनकाल सन् 1556 ई॰ से सन् 1627 ई॰ ) जीवन परिचय - रहीमदास का पूरा नाम अब्दुर्रहीम खानखाना था। इनका जन्म सन् 1556 ई॰ में लाहौर नगर (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। ये अकबर के संरक्षक बैरमखाॅं के पुत्र थे। किन्हीं कारणों से अकबर और बैरमखाॅं में मतभेद हो गया। अकबर ने बैरमखाॅं पर विद्रोह का आरोप लगाकर हज पर भेज दिया; मार्ग में ही शत्रु मुबारक खाॅं ने उनकी हत्या कर दी। बैरमखाॅं की हत्या के उपरान्त अकबर ने रहीम और उनकी माता को अपने पास बुला लिया तथा इनके पालन-पोषण एवं शिक्षा का उचित प्रबन्ध किया। अपनी प्रतिभा के द्वारा इन्होंने हिन्दी, संस्कृत, अरबी, फारसी तथा तुर्की भाषाओं का अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया। रहीम अकबर के दरबार के नवरत्नों में से एक थे। ये अकबर के प्रधान सेनापति और मन्त्री भी थे। ये एक वीर योद्धा थे और बड़े कौशल से सेना का संचालन करते थे। इनकी दानशीलता की अनेक कहानियाॅं प्रचलित हैं। अरबी, तुर्की, फारसी तथा संस्कृत के ये पण्डित थे। हिन्दी काव्य के ये मर्मज्ञ थे और हिन्दी कवियों का बड़ा सम्मान करते थे। गोस्वामी तुलसीदास से भी इनका परिचय तथा स्नेह-सम्बन्ध था। वीर-योद्धा हो...

Kabir Das Ka Jivan Parichay

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  ( जीवनकाल सन् 1398 ई॰ से सन् 1518 ई॰ ) जीवन परिचय - सन्त काव्यधारा अर्थात् भक्तिकाल की निर्गुण काव्यधारा की ज्ञानाश्रयी शाखा के प्रमुख एवं प्रतिनिधि कवि सन्त कबीर का जन्म ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा, सोमवार सन् 1398 ई॰ में माना जाता है- "चौदह सौ पचपन साल गए, चन्द्रवार एक ठाठ ठए। जेठ सुदी बरसाइत को, पूरनमासी प्रगट भए।।" हालाॅंकि कुछ अन्य विद्वान्; जैसे-श्यामसुन्दर दास, हजारीप्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल आदि 1456 वि. को ही कबीर का जन्म-सम्वत् स्वीकार करते हैं। एक जनश्रुति के अनुसार, इनका जन्म एक हिन्दू परिवार में हुआ था। इनकी माॅं विधवा ब्राह्मणी ने लोक-लाज के भय से इन्हें काशी के लहरतारा नामक स्थान पर एक तालाब के किनारे छोड़ दिया था, जहाॅं से नीरू नामक एक जुलाहा एवं उसकी पत्नी नीमा निःसन्तान होने के कारण इन्हें उठा लाए। कबीर का कथन है- 'काशी में हम परगट भए, रामानन्द चेताये।' इससे इनके जन्म स्थान और गुरु का पता चलता है। इनकी पत्नी का नाम लोई था तथा पुत्र कमाल एवं पुत्री कमाली थी। मस्तमौला एवं निर्भीक प्रकृति के कबीर व्यापक देशाटन एवं अनेक साधु-सन्तों के सम्पर्क ...

Keshavdas Ka Jivan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1555 ई॰ से सन् 1617 ई॰ ) जीवन परिचय - हिन्दी काव्य-जगत में रीतिवाद साहित्य के प्रारम्भकर्त्ता, प्रचारक और महाकवि केशवदास का जन्म मध्यभारत के ओरछा राज्य में संवत् 1612 विक्रमी (सन् 1555 ई॰) में हुआ था। इनके पिता का नाम काशीनाथ मिश्र था। इनके पितामह का नाम पं॰ कृष्णदत्त था। वंश परम्परा से केशव को गहन पाण्डित्य प्राप्त हुआ था। केशव राजाश्रय प्राप्त दरबारी कवि थे। ये ओरछा के राजा मधुकर शाह द्वारा विशेष सम्मानित थे। महाराज के अनुज इन्द्रजीत सिंह केशव को अपना गुरु मानते थे। ओरछा नरेश ने इनको 21 गाॅंव तथा मन्त्रिपद भी प्रदान किया था। संस्कृत भाषा और साहित्य पर अधिकार केशव के वंश की विशेषता थी। संवत् 1674 विक्रमी (सन् 1617 ई॰) में इनका स्वर्गवास हुआ था। महाकवि केशवदास का समय भक्ति तथा रीतिकाल का सन्धियुग था। तुलसी तथा सूर ने भक्ति की जिस पावनधारा को प्रवाहित किया था, वह तत्कालीन राजनीतिक एवं सामाजिक परिस्थितिवश क्रमशः ह्रासोन्मुख और क्षीण हो रही थी। दूसरी ओर जयदेव तथा विद्यापति ने जिस श्रृंगारिक कविता की नींव डाली थी, उसके अभ्युदय का आरम्भ हो चुका था। वास्तुकला तथा ललित कलाओं...

Suryakant Tripathi Nirala Ka Jivan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1897 ई॰ से सन् 196 1 ई॰ ) जीवन परिचय - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' का जन्म बंगाल के महिषादल राज्य के मेदिनीपुर जिले में 21 फरवरी, सन् 1897 ई॰ में हुआ था। इनके पिता पं॰ रामसहाय त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के बैसवाड़ा क्षेत्र के जिला उन्नाव के गढ़ाकोला ग्राम के निवासी थे और महिषादल राज्य में जाकर राजकीय सेवा में कार्य कर रहे थे। जब सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' जी छोटे ही थे तभी उनके माता-पिता का असामयिक निधन हो गया। युवा होने पर साहित्यिक अभिरुचि से सम्पन्न मनोहरा देवी से इनका विवाह हुआ। लेकिन वे भी शीघ्र ही इनमें साहित्यिक संस्कार जगाकर एक पुत्र और पुत्री का भार इनके ऊपर छोड़कर इस संसार से विदा हो गई। पुत्री सरोज जब बड़ी हुई तो इन्होंने उसका विवाह किया, लेकिन थोड़े ही दिनों में उसने भी ऑंखें मूॅंद लीं। सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' जी अपनी इस विवाहिता पुत्री के निधन से अत्यधिक क्षुब्ध हो उठे। निधन के इस विक्षोभ को इन्होंने अपनी रचना 'सरोजस्मृति' में वाणी दी। सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' जी ने प्रारम्भ में अपने परिवार के भरण-पोषण के लि...

Harishankar Parsai Ka Jivan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1924 ई॰ से सन् 1995 ई॰ ) आधुनिक हिन्दी-गद्य साहित्य के व्यंग्यकारों में हरिशंकर परसाई का नाम अग्रगण्य है। आपके व्यंग्य के विषय सामाजिक एवं राजनीतिक हैं। यद्यपि आपने साहित्य की अन्य विधाओं पर भी अपनी लेखनी चलाई है परन्तु आपकी प्रसिद्धि व्यंग्यकार के रूप में ही है। समय की कमजोरियों एवं राजनीति पर तीखे व्यंग्य करने में आप पटु हैं। जीवन परिचय - हरिशंकर परसाई का जन्म मध्य प्रदेश के इटारसी के निकट जमानी नामक ग्राम में 22 अगस्त, सन् 1924 ई॰ में हुआ था। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा से स्नातक तक की शिक्षा मध्य प्रदेश में हुई। आपने नागपुर विश्वविद्यालय से एम॰ ए॰ हिन्दी की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके पश्चात् कुछ वर्षों तक आपने अध्यापन कार्य किया। 10 अगस्त, सन् 1995 ई॰ में आपका स्वर्गवास हो गया। बाल्यावस्था से ही आपकी रुचि साहित्य लेखन में थी। अपने अध्यापन के साथ-साथ ही आप साहित्य सृजन करते रहे। परन्तु जब नौकरी साहित्य सृजन में बाधक होने लगी, तब आपने अध्यापन को तिलांजलि देकर साहित्य-साधना को ही अपना जीवन समर्पित कर दिया। आपने जबलपुर से 'वसुधा' नामक पत्रिका के सम्पादन एवं प्रकाश...

Tulsidas Ka Jivan Parichay

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( जीवनकाल सन् 1532 ई॰ से सन् 1623 ई॰ ) जीवन परिचय - भारतीय संस्कृति के उन्नायक तथा रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि गोस्वामी तुलसीदास जी का जन्म सन् 1532 ई॰ (वि. सम्वत् 1589) में राजापुर (बाॅंदा जिला) के सरयूपारीण ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न हुए थे। इनके पिता का नाम आत्माराम दुबे तथा माता का नाम हुलसी था। जन्म के कुछ दिनों बाद ही माता की मृत्यु हो जाने पर अभुक्त मूल नक्षत्र में उत्पन्न होने के कारण पिता ने इनका त्याग कर दिया। इसी दशा में इनकी भेंट रामानन्दीय सम्प्रदाय के साधु नरहरिदास से हुई, जिन्होंने इनको साथ लेकर विभिन्न तीर्थों का भ्रमण किया- बन्दौ गुरुपद कंज, कृपासिन्धु नर-रूप-हरि। कुछ समय के पश्चात् तुलसीदास स्वामी जी के साथ काशी आ गए, जहाॅं परम विद्वान् महात्मा शेषसनातन जी ने इन्हें वेद-वेदांग, दर्शन, इतिहास, पुराण आदि में निष्णात (प्रवीण) कर दिया। तुलसीदास का विवाह रत्नावली से हुआ, जिनके रूप पर ये अत्यधिक आसक्त थे। पत्नी के एक व्यंग्य से आहत होकर ये संन्यासी हो गए और काशी आ गए। लगभग 20 वर्षों तक इन्होंने समस्त भारत का भ्रमण किया और ये कभी अयोध्या, कभी चित्रकूट और कभी काशी में निव...